पवित्र आत्मा का आगमन
एक प्रचण्ड आँधी
इस पृथ्वी पर यीशु का आगमन जितना वास्तविक था, उतना ही वास्तविक था पवित्र आत्मा का आगमन भी। जिस प्रकार नबियों नें मसीह के आगमन की भविष्यवाणी की, उसी प्रकार उन्होने पवित्र आत्मा के आगमन की भी भविष्यवाणी की। यीशु मसीह के आने के सैकड़ों वर्ष पूर्व, परमेष्वर ने योएल नबी से कहा,
मैं अपना आत्मा तुम सभों पर भेज दूँगा,
तुम्हारे बेटे बेटियाँ भविष्यवाणी करेंगे,
तुम्हारे पुरनिये स्वप्न देखेंगे, और
तुम्हारे जवान दर्शन देखेंगे।
तुम्हारे दास और दासियों पर भी
मैं उन दिनों में अपना आत्मा उण्डेलूँगा। (योएल 2:28)।
पवित्र आत्मा आये। और कितना अद्भुत आगमन। एक प्रचण्ड आँधी की गूँज। अग्नि – जीभों की वर्षा। ईश्वर की शक्ति का प्रदर्शन। इस धरती पर उनका आगमन एक चमत्कारिक घटना से कदापि कम नहीं था।
जब पिन्तेकुस्त का दिन आ चुका था, सब शिष्य एक स्थान पर एक साथ इकठ्ठे थे। अचानक स्वर्ग से एक प्रचण्ड आँधी – जैसी आवाज सुनायी पड़ी, और वह सारा घर, जहाँ वे बैठे हुऐ थे, गूँज उठा। तब उन्हें आग की सी फटती हुइ जीभें दिखाई पड़ीं, और उनमें से हर एक पर आकर ठहर गयीं। और वे सब पवित्र आत्मा से परिपूरित हो गये और जैसे पवित्र आत्मा ने उन्हे वाणी का वरदान दिया, वे अन्य अन्य भाषाओं में बोलने लगे (प्रेरितों 2:1…4)।
यह ठीक ऐसा था जैसा कि यशायाह नें नबूवत की थी; ‘‘हकलाते ओंठों के साथ और एक अपरिचित भाषा में वह बोलेंगा ..’’ (यशा. 28:11)। ( मतलब अन्य अन्य भाषा में वह बोलेगा )
अब जिस समय यीशु का जन्म हुआ था, उस समय सन्नाटा और शान्ति का माहौल था। वह बैथलेहम की एक सुनसान रात थी, सुनहली रात थी। इतनी स्पष्ट और अंधेरी रात थी कि चरवाहे उस तारे का अनुसरण कर उस चरनी तक पहुँच गये। इस सुनसान महौल और पवित्र आत्मा के आगमन के उस प्रचण्ड आँधी के माहौल में कितना विरोध है। इससे यरुशलेम में इतना कोलाहल मचाया कि जब यह आवाज गूँज उठी, तब वहाँ भीड़ की भीड़ एकत्रित हो गयी, और दुविधा में पड़ गयी। (प्रेरितों 2:6)।
इस संदर्भ में मुझे एक अंग्रजी मुहावरा याद आ रहा है ‘‘जब ढिंढोरा पीटा गया।’’ इस अंग्रजी मुहावरे का अर्थ है कि शहर में कोई इधर – उधर घूम रहा था, यह कहते हुए, आइये और देखिये, क्या हो रहा है। लेकिन पवित्र आत्मा के सम्बन्ध में यह कोई छोटी – मोटी, ऐसी – वैसी, आवाज नहीं थी। यह इतना बड़ा कोलाहल था कि वस्तुतः सारे शहर में सुनाई पड़ा। यहाँ गौर करने की बात है, पृथ्वी भर के सब राष्ट्रों से आये हुए लोग यरुशलेम में रहते थे (पद 5)। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि उन लोंगो ने क्या सोच लिया होगा ?
वचन कहता है कि जब उन लोंगो ने यह आवाज सुनी तो वे घबराहट के साथ यह द्रश्य देखने दौड़ पड़े, क्योंकि हर एक अपनी – अपनी भाषा में उनको बोलते हुए सुन रहा था (पद 6)।
बिल्कुल अचम्भे में पड़ कर चकित हो कर वे बोल उठे, क्या ये बोलने वाले सब के सब गलीली नहीं हैं ? तो फिर यह कैसे सम्भव है कि इनमें से हर एक अपनी – अपनी जन्म भूमि की भाषा सुन रहा है ? (पद 7 – 8)। और जब उन लोंगो ने उनको ईश्वर के महान कार्यों का बखान करते हुए अपनी – अपनी भाषा में सुना, तो आपस में पूछा, इसका क्या मतलब हो सकता है ? (पद 12)।
_ 120 क्यों ? _
उनका यह बज्रपाती अप्रतीक्षित आगमन पत्थर से निर्मित एक मंदिर में स्थापित करने के लिये पूर्वनिर्धारित नहीं था। इसके बदले, पवित्र आत्मा 120 विश्वासियों पर उतर आये जो ईश्वर के नये मंदिर बन गये।
क्या आप को याद है कि जब सुलेमान ने अपना मन्दिर निर्माण खत्म किया तो उसके तुरहियाँ बजाते हुए ‘‘120 याजक’’ थे ? (2 इतिहास 5:12)।
बाइबल में लिखा है, प्रभु का घर एक बादल से भर गया था, और इस बादल के चलते याजक अपना सेवाकार्य पूरा करने में असमर्थ थे, क्योंकि प्रभु की महिमा से ईश्वर का मन्दिर भरा हुआ था (पद 13 – 14)।
उस ऊपरी कमरे में भी, पुनरुत्थान के बाद, फिर यही हुआ। एक सौ बीस एक साथ इकठ्ठे हो गये और ईश्वर के आत्मा से मन्दिर भर गया। क्यों 120? यह संख्या शरीर के युग का अन्त तथा आत्मा के युग के आरम्भ की सूचक है। उत्पत्ति में, जहाँ नूह 120 वर्षो तक नौका बना रहा था, वहाँ शरीर का युग समाप्त हो गया। ईश्वर ने कहा, ‘‘मेरा आत्मा सदा के लिये मनुष्य के साथ संघर्ष नहीं करेगा, क्योंकि वह सच में मरणशील है, फिर भी उसका जीवन काल (120) एक सौ बीस वर्ष होगा।’’ ( उत्पत्ति 6:3)
ठीक इसी मतलब से ही प्रभु ने पेन्तिकुस्त के दिन 120 लोंगो को एकत्रित किया ताकि पवित्र आत्मा ईश्वर को सभी राष्ट्रों के बीच में भेज दिया जा सके। इस प्रेरणा के साथ ही आत्मा के एक नये युग की शुरुआत को अंकित किया गया।
दर्शकों की समझ में नहीं आया कि यह क्या हो रहा था। कुछ लोंगों ने इसका मजाक उड़ाया और कहा, ‘‘इन्हे नयी अंगूरी का नशा चढ़ा है’’ (प्रेरितों 12:12) परन्तु पतरस ग्यारहों के साथ खड़ा हो कर ऊँची आवाज में बोल उठा, यहूदी भाइयो, और यरुषलेम के सब निवासियो, आप यह जान लें और मेरी बात पर विश्वास करें। जैसा कि आप लोग सोचते हैं, ये लोग पी कर मतवाले नहीं हैं, अभी तो दिन के नौ ही बजे हैं। इसके अलावा इस विषय में भविश्यद्वक्ता योएल के द्वारा भी भविष्यद्वाणी की थी (पद 14 – 16)।
ये 120 जन आत्मा से इतने भर गये कि वे अपने ही बल – बूते खड़े नहीं हो सके। आत्मा इतने प्रभावशाली थे कि उन्होने विश्वासियों के कार्यो को अपने काबू में कर लिया। वे उनकी बोली, भावनाओं, तथा आचरण को बदलते हुए उनमें क्रियाशील थे। जो यरुशलेम वासियों ने देखा वह मतवाला पन नहीं था, पर वह पवित्र आत्मा के अधीन में होने पर होने वाला एक अविश्वसनीय आनन्द था। ऐसी कुछ बातों के लिये मुझ पर भी आरोप लगाया गया है।
डरपोक पतरस में क्या परिवर्तन आया। यह उसके भीतर के छिपे प्रचारक को बाहर लाया, जब वह ऊँची आवाज में बोल उठा, और उसने उस बड़ी उमड़ती भीड़ को निर्भीकता से सम्बोधित किया। किन्तु आपकी क्या राय है कि उसको बोलने के लिये शब्द किसने दिये ? लोंगो को मुग्ध करने वाले, भावप्रवण प्रेरणात्मक शब्द पवित्र आत्मा के थे। क्योंकि हमारा सुसमाचार आपको न केवल निरेशब्दों में मिला, बल्कि सामर्थ में, तथा पवित्र आत्मा के द्वारा ही सुसमाचार प्रचार किया जाता है। ध्यान दें, ईशवचन कहता है, आत्मा उनके साथ कार्य करते हुए। जो कार्य करता है, वह तो पवित्र आत्मा ही हैं।
अब जरा ध्यान से देखिये, प्रेरितो के कार्य कलाप में अचानक यह क्या होने जा रहा है। जिन लोंगों ने पवित्र आत्मा को ग्रहण किया उन सभों को आत्मा बहुत बड़ा अधिकार देते हैं। पतरस और युहन्ना मन्दिर की ओर जा रहे थे, तो दोपहर के तीन बज रहे थे, और लोग एक आदमी को, जो जन्म से ही लंगड़ा था, लिये जा रहे थे। इसको रोज – रोज वे सुन्दर नामक फाटक के पास, मन्दिर में जानेवालों से भीख मांगने के लिये, बैठाया करते थे (प्रेरितों 3:2)।
इस अस्त – व्यस्त बेसहारे भिखारी की ओर मुड़ कर उस पर आँखें गड़ा कर, यूहन्ना के साथ, पतरस ने कहा, ‘‘हमारी ओर देख’’ (पद 4)। परिपूर्ण रुप से पवित्र आत्मा के कब्जे में आये एक व्यक्ति को देखते ही आप दंग रह जायेंगे। ज्यों ही पतरस ने उस गरीब आदमी की आत्मा की गहराई में झांक कर देखा – ठीक उसकी आँखों में से होकर – त्योंहि पतरस अपने में एक अनोखी निर्भीकता तथा सामर्थ से ओत – प्रोत हो गया, जो उसने इसके पहले कभी भी अनुभव नहीं किया।
इस भिखारी को पक्का विश्वास हो गया कि पतरस और यूहन्ना इसे चिढ़ा नहीं रहे थे। एक आलौकिक निर्भीकता इन प्रेरितों में साफ झलक रही थी। जब पतरस ने कहा, ‘‘हमारी ओर देख’’ तो उस आदमी ने उनसे कुछ पाने की आशा में उनकी ओर ध्यान दिया (पद 5)।
तब पतरस ने कहा, ‘‘सोना – चाँदी मेरे पास नहीं है, जो मरे पास है, वह मैं तुझे देता हूँ; यीशु नासरी के नाम से चल फिर (पद 6)। पतरस ने उसका दाहिना हाथ पकड़ कर उसको उठाने की मदद दी, और तुरन्त ही उसके पैर और टखने मजबूत हो गये। तब वह उछलते खड़ा हो गया और चलने फिरने लगा, और उनके साथ चल कर, उछलते – कूदते और ईश्वर की स्तुति गाते हुए मन्दिर गया (पद 7)।
क्या आप इस वक्त मन्दिर में हो रहे विस्मय की कल्पना कर सकते हैं ? उस मन्दिर में उस भिखारी का यह चमत्कारिक प्रवेश था। लोगों ने उसको जल्दी ही पहचान लिया ‘‘और उस घटना से जो उसके साथ हुई थी वे बहुत अचंभित और चकित हुए।’’

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